इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बहजोई एसपी से गाय वध मामले की FIR में 'विसंगतियों' पर मांगा स्पष्टीकरण

Summary: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बहराइच के पुलिस अधीक्षक से एक गोवध मामले की प्राथमिकी (FIR) में गंभीर विसंगतियों पर स्पष्टीकरण मांगा है. कोर्ट ने FIR की भाषा और घटना के समय को लेकर सवाल उठाए हैं, इसे 'मनगढ़ंत और अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर' बताया है. याचिकाकर्ता को गिरफ्तारी से अंतरिम राहत प्रदान की गई है.


इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बहराइच एसपी से गोवध मामले की FIR में 'विसंगतियों' पर मांगा स्पष्टीकरण

लखनऊ: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बहराइच जिले के पुलिस अधीक्षक (एसपी) से एक गोवध मामले की प्राथमिकी (FIR) में पाई गई 'विसंगतियों' पर स्पष्टीकरण मांगा है. कोर्ट ने यह टिप्पणी करते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि अदालतें अधिकारियों द्वारा दर्ज की जा रही 'मनगढ़ंत और अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर' पेश की जाने वाली FIRs पर रोक लगाएं.

न्यायमूर्ति अब्दुल मोईन और न्यायमूर्ति पी.के. श्रीवास्तव की लखनऊ पीठ ने याचिकाकर्ता अकबर अली को गिरफ्तारी से संरक्षण प्रदान करते हुए कहा कि यदि एसपी अपना व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल नहीं करते हैं, तो उन्हें मामले के पूरे रिकॉर्ड के साथ अदालत में पेश होना होगा. पीठ ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 16 मार्च की तारीख तय की है.

मामले की पृष्ठभूमि और याचिका

अकबर अली ने जरवल रोड पुलिस स्टेशन, बहराइच में 22 जनवरी को दर्ज की गई FIR को चुनौती देते हुए एक रिट याचिका दायर की थी. कोर्ट ने 16 फरवरी को यह आदेश पारित किया.

FIR के अनुसार, एक गुप्त सूचना के आधार पर पुलिस दल ने गोवध और हत्या के प्रयास के आरोप में तीन व्यक्तियों को गिरफ्तार किया था. जबकि तीन को मौके पर ही पकड़ लिया गया, चौथा व्यक्ति घटनास्थल से फरार हो गया. बाद में, इन लोगों ने अली का नाम भी अपराध में लिया.

FIR में पाई गई चौंकाने वाली विसंगतियां

FIR की समीक्षा करते हुए, पीठ ने पाया कि FIR में घटना का समय सुबह 10:45 बजे बताया गया था, और जब पुलिस दल मौके पर पहुंचा, तो अली और अन्य को यह कहते हुए सुना गया कि उन्हें भाग जाना चाहिए क्योंकि 'सुबह होने वाली थी'. पीठ इस बात से हैरान थी कि 'सुबह 10:45 बजे कैसे हो सकती है'.

कोर्ट ने FIR में कुछ 'नियमित टिप्पणियों' पर भी ध्यान दिया और कहा कि वे 'किसी फिल्म की पटकथा' से ली गई प्रतीत होती हैं.

पीठ ने आगे कहा,

न्यायपालिका का कड़ा रुख

इलाहाबाद हाईकोर्ट की यह टिप्पणी पुलिस अधिकारियों द्वारा FIR दर्ज करने के तरीके पर बढ़ती चिंता को दर्शाती है. कोर्ट ने पहले भी फर्जी FIRs और पुलिस आचरण पर सवाल उठाए हैं, जिसमें झूठी जानकारी देने वाले मुखबिरों पर मुकदमा चलाने और FIRs में अभियुक्तों की जाति दर्ज करने की प्रथा पर भी आपत्ति व्यक्त की गई है.

इस मामले में, कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि एसपी दो सप्ताह के भीतर व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल नहीं करते हैं, तो उन्हें मामले के रिकॉर्ड के साथ व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होना होगा. यह कदम पुलिसिंग में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है.

याचिकाकर्ता अकबर अली को गिरफ्तारी से अंतरिम संरक्षण प्रदान किया गया है, जिससे उन्हें कानूनी प्रक्रिया के तहत निष्पक्ष सुनवाई का अवसर मिल सके. मामले की अगली सुनवाई 16 मार्च को होगी, जिस पर सभी की निगाहें टिकी होंगी.