उदासी का मंज़र

Ghazal — By Furkan S Khan

Kaafiya: शाम, नाम, काम  |  Radeef: है
दिल में अब भी एक अनकही उदासी का शाम है लबों पर मेरे आज भी बस तेरा ही नाम है ज़िंदगी में अब कोई नया न रहा कोई काम है सब कुछ खोकर भी जीने का एक अलग मुकाम है

Ghazal — By Furkan S Khan

Kaafiya: राख, शाख, खाक  |  Radeef: है
मेरे अरमानों की बस्ती अब जलकर राख है टूट चुकी है वो उम्मीदों की एक नाज़ुक शाख है सब कुछ बिखर गया और हो गया सब कुछ खाक है मुसाफिर बनकर तन्हा चलना ही मेरा अब मुसाफ़ है