विकल्प की बात परदेस की? सुरक्षित गर्भपात हर स्त्री का हक

भारत में महिलाओं के लिए सुरक्षित गर्भपात तक पहुँच केवल एक स्वास्थ्य सेवा का मुद्दा नहीं है। यह उनकी स्वायत्तता, गरिमा और जीवन के अधिकार का मूल आधार है। समाज में अक्सर ‘विकल्प’ को एक भ्रम बताया जाता है, खासकर जब बात महिलाओं के प्रजनन अधिकारों की हो। लेकिन, सुरक्षित गर्भपात तक समान और सुलभ पहुँच को अब कोई भ्रम नहीं रहने देना चाहिए। यह एक हकीकत बन सकती है, जिसे हर कीमत पर सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

देश में हर साल लाखों महिलाएँ अनचाही गर्भावस्था का सामना करती हैं। ऐसे में सुरक्षित और कानूनी गर्भपात तक पहुँच न होना उन्हें खतरनाक विकल्पों की ओर धकेलता है। यह सीधे तौर पर उनके स्वास्थ्य और जीवन को खतरे में डालता है। भारत सरकार ने इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं, लेकिन अभी भी मीलों का सफर बाकी है।

कानूनी ढाँचा: सुरक्षित पहुँच की नींव

भारत ने 1971 में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) अधिनियम के साथ एक प्रगतिशील कदम उठाया। यह उस समय दुनिया के कुछ मुट्ठी भर देशों में से एक था जहाँ गर्भपात को कानूनी मान्यता दी गई। वर्ष 2021 में इस अधिनियम में महत्वपूर्ण संशोधन किए गए। इन संशोधनों ने गर्भपात की अनुमति देने वाली गर्भावस्था की अवधि को बढ़ाया। कुछ विशेष श्रेणियों की महिलाओं के लिए इसे 20 सप्ताह से बढ़ाकर 24 सप्ताह कर दिया गया। यह कानून महिलाओं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को केंद्र में रखता है। यह एक बड़ी जीत थी।

इन कानूनी बदलावों का उद्देश्य महिलाओं को सुरक्षित और सम्मानजनक तरीके से स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराना है। इससे अवैध गर्भपात से होने वाली मौतों और जटिलताओं को कम किया जा सके। कानून ने कानूनी सुरक्षा प्रदान की है, लेकिन इसे ज़मीन पर उतारना अभी भी एक बड़ी चुनौती है।

राह में रोड़े: पहुँच के अवरोध

कानूनी ढाँचा मजबूत होने के बावजूद, सुरक्षित गर्भपात तक पहुँच में कई बाधाएँ हैं। सबसे बड़ी समस्या जागरूकता की कमी है। ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में महिलाओं को अक्सर अपने अधिकारों या उपलब्ध सुविधाओं के बारे में जानकारी नहीं होती। सामाजिक कलंक भी एक बड़ी दीवार है। कई महिलाएँ सामाजिक शर्मिंदगी के डर से सही जानकारी या सेवाएँ लेने से कतराती हैं।

स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी भी एक गंभीर मुद्दा है। विशेष रूप से सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में योग्य चिकित्सकों और आवश्यक बुनियादी ढाँचे का अभाव है। एमटीपी अधिनियम के तहत, केवल प्रशिक्षित डॉक्टर ही गर्भपात कर सकते हैं। ऐसे डॉक्टरों की संख्या ग्रामीण इलाकों में कम है। इससे महिलाओं को लंबी दूरी तय करनी पड़ती है या फिर असुरक्षित तरीकों का सहारा लेना पड़ता है।

असुरक्षित प्रक्रियाओं का अंधकारमय सच

जब सुरक्षित और कानूनी विकल्प नहीं मिलते, तो महिलाएँ अक्सर असुरक्षित गर्भपात प्रक्रियाओं की ओर मुड़ जाती हैं। ये प्रक्रियाएँ अयोग्य व्यक्तियों द्वारा, अस्वच्छ परिस्थितियों में की जाती हैं। इसके परिणाम भयावह होते हैं। अत्यधिक रक्तस्राव, गंभीर संक्रमण, गर्भाशय को क्षति, और दीर्घकालिक बाँझपन इसके कुछ सामान्य परिणाम हैं। दुखद रूप से, कई महिलाएँ अपनी जान तक गँवा देती हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, असुरक्षित गर्भपात वैश्विक स्तर पर मातृ मृत्यु के प्रमुख कारणों में से एक है। भारत में भी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। इन मौतों को रोका जा सकता है। सिर्फ सुरक्षित स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच सुनिश्चित करके।

आगे की राह: सशक्त पहुँच की आवश्यकता

सुरक्षित गर्भपात तक पहुँच को एक वास्तविकता बनाने के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है। सबसे पहले, व्यापक जागरूकता अभियान चलाने होंगे। महिलाओं को उनके अधिकारों और उपलब्ध सुरक्षित सुविधाओं के बारे में शिक्षित करना महत्वपूर्ण है। दूसरा, स्वास्थ्य सेवा प्रणाली को मजबूत करना होगा। इसमें ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में एमटीपी सुविधाएँ प्रदान करने वाले केंद्रों की संख्या बढ़ाना शामिल है।

चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों को प्रशिक्षण देना भी उतना ही ज़रूरी है। उन्हें न केवल तकनीकी रूप से सक्षम बनाना है, बल्कि उन्हें संवेदनशीलता और गोपनीयता बनाए रखने का भी प्रशिक्षण देना चाहिए। सामाजिक कलंक को दूर करने के लिए सामुदायिक स्तर पर संवाद शुरू करने की आवश्यकता है। यह सुनिश्चित करना होगा कि हर महिला, चाहे वह कहीं भी रहती हो, सम्मान और सुरक्षा के साथ अपनी प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच बना सके। विकल्प का भ्रम तोड़ना ही होगा। सुरक्षित गर्भपात एक अधिकार है, और इसकी पहुँच सुनिश्चित की जानी चाहिए।

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