Key Highlights
- तापसी पन्नू का दमदार अभिनय फिल्म का सबसे बड़ा प्लस पॉइंट है।
- पटकथा में निरंतरता की कमी के कारण कहानी का प्रभाव कम हो जाता है।
- एक्शन दृश्यों में तीव्रता है, लेकिन शोर-शराबा भावनाओं पर हावी हो गया है।
कहानी और प्रदर्शन का संतुलन
तापसी पन्नू अपनी हर फिल्म में एक अलग छाप छोड़ने की कोशिश करती हैं। 'गांधारी' में भी उन्होंने एक ऐसी मां का किरदार निभाया है जो अपने अतीत की परतों को खोलते हुए अपने बच्चे को बचाने के लिए पूरी व्यवस्था से भीड़ जाती है। उनके चेहरे पर गुस्सा और लाचारी साफ झलकती है, लेकिन अफसोस की बात है कि लेखकों ने उन्हें एक ऐसी पटकथा दी है जो दिशाहीन मालूम पड़ती है।
शोर-शराबे में खोई संवेदनाएं
फिल्म का निर्देशन कई मौकों पर काफी जोर-जबरदस्ती वाला लगता है। दृश्यों के बीच का तालमेल गायब है और बैकग्राउंड म्यूजिक कई बार संवादों से कहीं ज्यादा शोर मचाता है। किसी भी थ्रिलर फिल्म में सस्पेंस बनाए रखना जरूरी होता है, लेकिन यहां सब कुछ इतना तेज और बेतरतीब है कि दर्शक कहानी के साथ जुड़ नहीं पाते।
क्या ये फिल्म आपको बांधे रख पाएगी?
अगर आप सिर्फ तापसी पन्नू के अभिनय के प्रशंसक हैं, तो आपको फिल्म के कुछ हिस्से पसंद आ सकते हैं। हालांकि, एक संपूर्ण सिनेमाई अनुभव की तलाश कर रहे दर्शकों को निराशा हाथ लग सकती है। फिल्म का ड्रामा जरूरत से ज्यादा नाटकीय है और तर्कशक्ति की यहां भारी कमी खलती है।
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क्या आपने 'गांधारी' देखी? क्या आपको लगता है कि तापसी पन्नू का अभिनय फिल्म की कमजोर पटकथा को बचाने के लिए काफी था? अपनी राय हमें जरूर बताएं।
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