Key Highlights

  • भारत संयुक्त राष्ट्र की नस्लीय भेदभाव विरोधी संधि (CERD) के प्रमुख शिल्पकारों में से एक था।
  • देश अब संधि की समीक्षा प्रक्रिया में हिस्सा लेने से मना कर रहा है, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सवाल उठ रहे हैं।
  • विवाद का मुख्य बिंदु 'जाति' और 'नस्ल' के बीच की परिभाषा और दायरे से जुड़ा है।

एक ऐतिहासिक जुड़ाव, एक मौजूदा गतिरोध

नस्लीय भेदभाव के सभी रूपों के उन्मूलन पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन (CERD) संयुक्त राष्ट्र की सबसे महत्वपूर्ण मानवाधिकार संधियों में से एक है। इस ऐतिहासिक समझौते को तैयार करने में भारत ने एक अग्रणी भूमिका निभाई थी। भारत इसके शुरुआती हस्ताक्षरकर्ताओं में शामिल था, जिसने वैश्विक स्तर पर नस्लवाद से लड़ने की प्रतिबद्धता दर्शाई थी।

लेकिन, आज स्थिति कुछ अलग है। दुनिया को तब आश्चर्य हुआ जब भारत ने हाल ही में संयुक्त राष्ट्र समिति (CERD) द्वारा अपनी मानवाधिकार स्थिति की समीक्षा में शामिल होने से इनकार कर दिया। यह एक ऐसा कदम है जिसने नई दिल्ली के अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों के प्रति दृष्टिकोण पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

क्यों उठ रहे हैं सवाल?

यह गतिरोध किसी नए मुद्दे से नहीं उपजा है। दरअसल, संयुक्त राष्ट्र की नस्लीय भेदभाव विरोधी समिति (CERD) लंबे समय से जाति-आधारित भेदभाव को नस्लीय भेदभाव के एक रूप के रूप में देखती रही है। समिति का तर्क है कि 'नस्ल' शब्द की व्याख्या व्यापक रूप से की जानी चाहिए, जिसमें वंश के आधार पर होने वाला भेदभाव भी शामिल हो। भारत इस दृष्टिकोण का कड़ा विरोध करता रहा है।

भारत सरकार का लगातार यह मत रहा है कि जाति एक सामाजिक वर्गीकरण है, नस्लीय पहचान नहीं। यह तर्क भारत की संप्रभुता और आंतरिक मामलों में बाहरी हस्तक्षेप न करने के सिद्धांत से जुड़ा है।

भारत का तर्क: 'जाति' बनाम 'नस्ल'

नई दिल्ली का कहना है कि CERD संधि विशेष रूप से 'नस्ल', 'रंग', 'वंश' और 'राष्ट्रीय या जातीय मूल' के आधार पर भेदभाव को संबोधित करती है। भारत का दृढ़ मत है कि 'जाति' इनमें से किसी भी श्रेणी में नहीं आती। भारतीय अधिकारियों ने अक्सर इस बात पर जोर दिया है कि भारत का संविधान जातिगत भेदभाव को प्रतिबंधित करता है और इसके उन्मूलन के लिए व्यापक कानून मौजूद हैं।

यह स्थिति अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और संयुक्त राष्ट्र के कुछ विशेषज्ञों के साथ एक सीधा टकराव पैदा करती है। वे मानते हैं कि वंश के आधार पर भेदभाव के परिणाम नस्लीय भेदभाव के समान ही होते हैं, जिससे हाशिए पर पड़े समुदायों को मूलभूत अधिकारों से वंचित होना पड़ता है।

💡 Did You Know? संयुक्त राष्ट्र की नस्लीय भेदभाव विरोधी संधि (CERD) 1969 में लागू हुई थी और यह मानवाधिकारों पर सबसे पुराने और सबसे व्यापक संधियों में से एक है।

संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार निकायों की चिंताएँ

संयुक्त राष्ट्र की नस्लीय भेदभाव विरोधी समिति (CERD) ने पहले भी भारत से अपने घरेलू कानूनों और नीतियों में जातिगत भेदभाव को संबोधित करने का आग्रह किया है। समिति का मानना है कि जाति-आधारित भेदभाव के शिकार लोगों को पर्याप्त सुरक्षा और निवारण नहीं मिल पा रहा है। मानवाधिकार विशेषज्ञों और नागरिक समाज संगठनों का तर्क है कि जातीयता या वंश के आधार पर होने वाला कोई भी भेदभाव, चाहे उसे किसी भी नाम से पुकारा जाए, नस्लीय भेदभाव की श्रेणी में आता है और CERD के दायरे में आना चाहिए।

आगे की राह और अंतर्राष्ट्रीय निहितार्थ

भारत का समीक्षा से इनकार एक महत्वपूर्ण मोड़ है। यह न केवल CERD समिति के साथ उसके संबंधों को प्रभावित करता है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मंचों पर उसकी विश्वसनीयता को भी चुनौती देता है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में, भारत की मानवाधिकार प्रतिबद्धताएं वैश्विक स्तर पर देखी जाती हैं। यह गतिरोध एक जटिल कूटनीतिक चुनौती पेश करता है, जिसमें संप्रभुता के सम्मान और सार्वभौमिक मानवाधिकारों के पालन के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता है।

यह देखना दिलचस्प होगा कि यह गतिरोध कैसे सुलझता है और क्या भारत अपनी स्थिति पर पुनर्विचार करता है। इस मुद्दे के दीर्घकालिक परिणाम भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि और मानवाधिकार संवाद में उसकी भागीदारी पर गहरे पड़ सकते हैं। इस मुद्दे पर अधिक विस्तृत समाचार कवरेज के लिए, Vews.in पर बने रहें।