हाल ही में सोशल मीडिया पर एक तस्वीर तेजी से फैली, जिसमें यह दावा किया गया कि मुख्य जनसंपर्क अधिकारी (CJP) सौरव दास एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) उपकरण ChatGPT का उपयोग कर रहे थे। यह दावा पूरी तरह से निराधार निकला। गहन पड़ताल और तथ्यों की जांच के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि तस्वीर में जो कुछ दिखाया गया, वह वास्तविकता से बिल्कुल अलग था।
यह वायरल तस्वीर विभिन्न ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर खूब शेयर की गई। इससे गलत सूचना का माहौल बन गया। कई लोग यह सवाल उठा रहे थे कि क्या एक वरिष्ठ अधिकारी अपनी आधिकारिक ब्रीफिंग के लिए किसी AI टूल पर निर्भर कर रहे हैं। इस अटकलबाजी ने अनावश्यक रूप से विवाद को हवा दी।
तस्वीर का असली सच क्या है?
वायरल तस्वीर की सावधानीपूर्वक जांच करने पर सच्चाई सामने आई। सौरव दास अपने लैपटॉप पर काम कर रहे थे। लेकिन स्क्रीन पर ChatGPT का जाना-पहचाना इंटरफेस नहीं था। इसके बजाय, वे संभवतः अपनी प्रेस ब्रीफिंग से संबंधित महत्वपूर्ण दस्तावेजों, नोट्स या किसी संदर्भ सामग्री को देख रहे थे। यह एक सामान्य अभ्यास है। पत्रकार और अधिकारी अक्सर प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान सटीक जानकारी देने के लिए ऐसे गैजेट्स का उपयोग करते हैं। वे अपने तथ्यों को क्रॉस-चेक करते हैं या अपनी बात को पुख्ता करते हैं।
विशेषज्ञों ने भी इस तस्वीर का विश्लेषण किया है। उन्होंने स्पष्ट रूप से पुष्टि की कि स्क्रीन पर कोई ChatGPT जैसी चैट विंडो या उसका लोगो दिखाई नहीं दे रहा था। यह मात्र एक सामान्य लैपटॉप स्क्रीन थी, जिस पर कोई वेब पेज या कोई महत्वपूर्ण दस्तावेज़ खुला हो सकता था। इस गलत धारणा ने ही पूरी कहानी को जन्म दिया और बेवजह एक गलत सूचना फैलाई गई।
गलत सूचना का प्रसार और जिम्मेदार पत्रकारिता
आज के डिजिटल युग में, सोशल मीडिया पर किसी भी जानकारी को साझा करने से पहले उसकी सच्चाई परखना बेहद जरूरी है। यह घटना दर्शाती है कि कैसे एक छोटी सी गलतफहमी या अधूरी जानकारी बड़े पैमाने पर भ्रम पैदा कर सकती है। जिम्मेदार पत्रकारिता और एक नागरिक के रूप में हमारी भूमिका यहीं महत्वपूर्ण हो जाती है। हमें हमेशा सतर्क रहना चाहिए।
यह उदाहरण एक बार फिर दिखाता है कि कैसे एक सामान्य तस्वीर को गलत संदर्भ में प्रस्तुत करके अफवाहों को बढ़ावा दिया जा सकता है। CJP सौरव दास का लैपटॉप पर काम करना उनकी पेशेवर जिम्मेदारियों का हिस्सा था। इसमें किसी AI टूल का अनैतिक उपयोग बिल्कुल भी नहीं था। ऐसे दावों पर बिना सोचे-समझे भरोसा करना समाज के लिए खतरनाक हो सकता है।
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