उदासी पर एक मार्मिक क़िता: अकेलेपन की आह - फरकान एस खान

फरकान एस खान द्वारा रचित 'अकेलेपन की आह' एक मार्मिक क़िता है जो उदासी, दर्द और अकेलेपन की गहराइयों को दर्शाती है।

Monday, August 24, 2026
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उदासी पर एक मार्मिक क़िता: अकेलेपन की आह - फरकान एस खान
“उदासी पर एक मार्मिक क़िता: अकेलेपन की आह - फरकान एस खान”
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https://www.vews.in/a-poignant-qita-on-sadness-the-sigh-of-loneliness-furkan-s-khan
Date
24 August 2026
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Qita By Furkan S Khan
रात भर जागना, दिल को सताना है, किसको ये दर्द अपना बताना है। हर ख़ुशी दूर हुई, गम का ठिकाना है, अब तो बस आँसुओं को बहाना है।
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Qita By Furkan S Khan
लबों पे हँसी, मगर दिल में है मातम, क्या करें हम? कोई समझे न इस दर्द का मौसम, क्या करें हम? अश्कों में ढली हर रात का आलम, क्या करें हम? बस चुपचाप सहते हैं ये सारे सितम, क्या करें हम?
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Qita By Furkan S Khan
जब से टूटे हैं ख़्वाब सारे, दिल में बस गए हैं अँधेरे। रोशनी की किरणें भी अब नहीं घेरे, बस उदासी के साये हैं मेरे।

अकेलेपन की आह

Qita — By Furkan S Khan

Kaafiya: सताना, बताना, ठिकाना, बहाना  |  Radeef: है
रात भर जागना, दिल को सताना है, किसको ये दर्द अपना बताना है। हर ख़ुशी दूर हुई, गम का ठिकाना है, अब तो बस आँसुओं को बहाना है।

Qita — By Furkan S Khan

Kaafiya: मातम, मौसम, आलम, सितम  |  Radeef: क्या करें हम?
लबों पे हँसी, मगर दिल में है मातम, क्या करें हम? कोई समझे न इस दर्द का मौसम, क्या करें हम? अश्कों में ढली हर रात का आलम, क्या करें हम? बस चुपचाप सहते हैं ये सारे सितम, क्या करें हम?

Qita — By Furkan S Khan

Kaafiya: सारे, अँधेरे, घेरे, मेरे
जब से टूटे हैं ख़्वाब सारे, दिल में बस गए हैं अँधेरे। रोशनी की किरणें भी अब नहीं घेरे, बस उदासी के साये हैं मेरे।

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Zainab
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