महाराष्ट्र टाइगर कॉरिडोर में खनन के खिलाफ संघर्ष: भूख हड़ताल पर बैठे कार्यकर्ता को जबरन हटाया गया
महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में, जो अपने समृद्ध वन्यजीवों, विशेषकर बाघों के लिए जाना जाता है, एक गंभीर मुद्दा सामने आया है। यहां के बाघ गलियारों (Tiger Corridors) में हो रहे खनन (Mining) के खिलाफ आवाज उठाने वाले एक पर्यावरण कार्यकर्ता को पुलिस ने उनकी भूख हड़ताल के दौरान जबरन हटा दिया। यह घटना राज्य में पर्यावरण संरक्षण और विकास की बहस को फिर से गरमा गई है।
क्यों हो रहा है विरोध?
विदर्भ का यह क्षेत्र कई महत्वपूर्ण बाघ गलियारों का घर है, जो विभिन्न राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों को जोड़ते हैं। इन गलियारों का संरक्षण बाघों और अन्य वन्यजीवों के अस्तित्व के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह सुनिश्चित करता है कि वे भोजन, पानी और प्रजनन के लिए सुरक्षित रूप से घूम सकें।
हालांकि, हाल के वर्षों में, इन संवेदनशील क्षेत्रों के पास या सीधे उनके भीतर खनन गतिविधियों की अनुमति दी गई है। कार्यकर्ताओं का तर्क है कि यह खनन न केवल इन वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास को नष्ट कर रहा है, बल्कि जल स्रोतों को भी प्रदूषित कर रहा है और क्षेत्र की पारिस्थितिकी को गंभीर नुकसान पहुंचा रहा है।
कार्यकर्ता की भूख हड़ताल और कार्रवाई
इस गंभीर स्थिति के विरोध में, एक समर्पित पर्यावरण कार्यकर्ता, श्री सुनील देशपांडे (काल्पनिक नाम), ने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की। उनकी मांग स्पष्ट थी: बाघ गलियारों में तत्काल खनन पर रोक लगाई जाए और पर्यावरणीय प्रभाव का निष्पक्ष मूल्यांकन किया जाए।
देशपांडे, जो पिछले कई दिनों से स्थानीय विश्राम गृह के बाहर धरना दे रहे थे, ने अपने स्वास्थ्य की परवाह किए बिना अपना विरोध जारी रखा। उनकी स्थिति को बिगड़ता देख, स्थानीय प्रशासन और पुलिस ने हस्तक्षेप करने का फैसला किया।
सूत्रों के अनुसार, पुलिस ने मंगलवार की सुबह श्री देशपांडे को उनकी इच्छा के विरुद्ध, एम्बुलेंस में ले जाकर नजदीकी अस्पताल में भर्ती कराया। इस कार्रवाई को कार्यकर्ताओं और उनके समर्थकों द्वारा 'दमनकारी' बताया जा रहा है, जबकि अधिकारियों का कहना है कि यह उनकी जान बचाने के लिए किया गया एक आवश्यक कदम था।
आगे क्या?
इस घटना ने स्थानीय समुदायों, पर्यावरण समूहों और वन्यजीव प्रेमियों के बीच आक्रोश पैदा कर दिया है। वे इस बात पर जोर दे रहे हैं कि विकास परियोजनाओं को वन्यजीव संरक्षण के साथ संतुलित करने की आवश्यकता है।
कार्यकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो वे विरोध प्रदर्शन के नए तरीके अपनाएंगे। यह मामला अब राष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बन गया है, जिसमें कई पर्यावरण संगठन महाराष्ट्र सरकार से हस्तक्षेप करने और इन महत्वपूर्ण बाघ गलियारों की रक्षा करने की अपील कर रहे हैं।
यह घटना एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या आर्थिक विकास के नाम पर हम प्रकृति और उसके सबसे कीमती जीवों के भविष्य के साथ समझौता कर रहे हैं।