नरेंद्र मोदी की सरकार, जो 2014 से सत्ता में आने के बाद से लगातार जातिगत जनगणना से किनारा करती रही थी, ने बीते कल अचानक इसको कराने की घोषणा कर दी। यह निर्णय राजनीतिक गलियारों में एक बड़ी हलचल का कारण बना है।

सोशल मीडिया पर नाराजगी

सोशल मीडिया पर भाजपा समर्थकों में खासी नाराजगी देखी जा रही है। कई लोग लिख रहे हैं कि “हम तो पाकिस्तान पर हमला होने की तैयारी में थे, और सरकार ने हमें जातिगत जनगणना में उलझा दिया।” यह असंतोष नई राजनीति के संकेत दे रहा है।

राहुल गांधी की जीत या विपक्ष की चाल?

राजनीतिक विश्लेषक इसे राहुल गांधी की बड़ी जीत मान रहे हैं। कुछ लोग तो यहां तक कह रहे हैं कि सरकार अब विपक्ष के दबाव में काम कर रही है। ऐसे वक्त में जब सत्ताधारी दल की नीति बदलती है, तो उसका प्रभाव गहरा होता है।

क्या होगा इस जनगणना का परिणाम?

वास्तविक सच्चाई तो अब इस जनगणना के बाद ही सामने आएगी। कहीं ऐसा न हो कि यह भी सच्चर कमेटी की तरह धूल फांकती रह जाए। उम्मीद की जा रही है कि यह जनगणना केवल कागज़ों तक सीमित न रहे, बल्कि ज़मीन पर भी कार्य हो।

विपक्ष की यह भी मांग है कि जो शैक्षणिक रूप से पिछड़े हैं, उन्हें शिक्षा में आरक्षण मिले, और आर्थिक पिछड़ेपन को सरकारी योजनाओं व नौकरियों में आरक्षण देकर मुख्यधारा में लाया जाए।

न्याय की राह आसान नहीं होती, पर यदि नीति संकल्पित हो तो बदलाव निश्चित है।