दिल-ए-नादाँ की दास्तान: एक दर्द भरी ग़ज़ल - Furkan S Khan

Furkan S Khan द्वारा प्रस्तुत, दिल-ए-नादाँ की दास्तान एक मार्मिक ग़ज़ल है जो टूटे हुए दिल के दर्द, इंतज़ार और इश्क़ में मिली बेवफाई को बयां करती है।

Friday, September 18, 2026
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दिल-ए-नादाँ की दास्तान: एक दर्द भरी ग़ज़ल - Furkan S Khan
“दिल-ए-नादाँ की दास्तान: एक दर्द भरी ग़ज़ल - Furkan S Khan”
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18 September 2026
दिल-ए-नादाँ की दास्तान: एक दर्द भरी ग़ज़ल - Furkan S Khan
Ghazal — By Furkan S Khan
दर्द-ए-दिल का अब हमें कोई करार नहीं, इश्क़ में डूबे मगर कोई इंतज़ार नहीं। वो जो कहते थे कि तुमसा कोई यार नहीं, आज उनके लब पे मेरा कोई इज़हार नहीं। ज़िंदगी बन गई है अब ग़मों का गुबार, राहतों का अब कोई ज़रा भी आसार नहीं। जान दे दें हम भी अगर आए मौत कभी, जीने की अब कोई ख़्वाहिश निसार नहीं। टूट कर चाहा जिसे वो भी जुदा हो गया, दिल-ए-नादाँ को अब कोई बेकरार नहीं।
Ghazal — By Furkan S Khan
हर शाम ये दिल मेरा तन्हा रहता है अब तो, यादों में तेरी हर पल सहमा रहता है अब तो। वो जो वादा था तुम्हारा, वो कहाँ गुम हुआ, अश्कों का दरिया आँखों से बहता है अब तो। जिसकी खातिर छोड़ा था सारा जहाँ मैंने, वो भी मेरा नाम लेने से डरता है अब तो। हर एक आह में बस तेरा ही नाम रहता है, ग़म का हर लम्हा मुझको सताता है अब तो। टूट गए सारे सपने, बिखर गई है दुनिया, बस एक ख़ामोशी ही मेरे पास रहती है अब तो।

करार: शांति, चैन इज़हार: व्यक्त करना, कहना गुबार: धूल, उदासी निसार: अर्पित करना, बलिदान करना आसार: संकेत दिल-ए-नादाँ: नासमझ दिल

तन्हा: अकेला सहमा: डरा हुआ, भयभीत अश्कों का दरिया: आँसुओं की नदी आह: गहरी साँस, दर्द की आवाज़ ग़म: दुःख

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Zainab
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