शाम-ए-ग़म की तन्हाइयों में, कोई अपना सा लगे,
धड़कनों की इस ख़ामोशी में, कोई नग़मा सा लगे।
जाने कब से आँखें राह तकती हैं उसकी,
हर आहट पर दिल को उसका भरम सा लगे।
चाँद भी अब उदास है, तारे भी ग़मगीन,
उसकी यादों का हर साया, एक मरहम सा लगे।
कभी ये दिल ख़ुशियों से गुलज़ार था,
अब हर ख़्वाब भी एक मातम सा लगे।
मोहब्बत की राहों में रहगुज़र हूँ मैं,
हर मोड़ पर बस तेरा नाम सा लगे।
— Furkan S Khan