उदासी का कारवाँ: फ़ुरकान एस ख़ान की दर्द भरी ग़ज़ल

दिल में छुपे दर्द और तन्हाई को बयाँ करती फ़ुरकान एस ख़ान की ये ग़ज़ल उदासी के गहरे रंगों को दर्शाती है।

Thursday, September 17, 2026
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उदासी का कारवाँ: फ़ुरकान एस ख़ान की दर्द भरी ग़ज़ल
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17 September 2026
उदासी का कारवाँ: फ़ुरकान एस ख़ान की दर्द भरी ग़ज़ल
Ghazal — By Furkan S Khan
दिल में छुपा जो दर्द है, वो बेज़ुबाँ क्या है। अश्कों में बहता मेरा, ये कारवाँ क्या है। हर साँस में बस एक उदासी का रंग है, खुशियों से मेरा अब भला, ये वास्ता क्या है। वीरान सी राहों पे, तन्हाई का साया है, इस भीड़ में अपना कोई, निशान क्या है। पलकों पे ठहरी नमी, आँखों में गहरा ग़म, इस हाल-ए-दिल का भला, कोई बयाँ क्या है।
Ghazal — By Furkan S Khan
इस दिल को कहीं अब कोई, मिलता करार नहीं। गुज़री जो बहारें, उनका फिर इंतज़ार नहीं। आँखों से बरसता है, ये कैसा सावन है, जिसमें कोई खुशियों का, अब तो गुज़ार नहीं। तन्हाइयों का साया है, हर मोड़ पर मेरे, साथ चलने वाला कोई, मेरा यार नहीं। लफ़्ज़ों में छुपा दर्द, खामोश है ज़ुबाँ मेरी, कहने को मेरे पास अब, कोई इकरार नहीं।

बेज़ुबाँ: जिसे ज़ुबान न हो, जो बोल न सके। कारवाँ: यात्रा, काफिला, लगातार चलना। वास्ता: संबंध, नाता। निशान: चिह्न, पहचान। बयाँ: वर्णन, कहना।

करार: चैन, शांति। बहारें: खुशियाँ, अच्छा समय। इंतज़ार: प्रतीक्षा। गुज़ार: गुज़रना, होना। (यहाँ "गुज़ार नहीं" का अर्थ है कोई रास्ता या ठिकाना नहीं) इकरार: स्वीकारोक्ति, सहमति।

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Zainab
लेखक

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