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हम और ज़िंदगी
ज़िंदगी का सफ़र: फ़ुरक़ान एस ख़ान की प्रेरणादायक नज़्म
फ़ुरक़ान एस ख़ान द्वारा रचित 'ज़िंदगी का सफ़र' नामक नज़्म जीवन के उतार-चढ़ाव और आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। एक अनमोल कविता जो हर पल को जीने का संदेश देती है।
Nazm By Furkan S Khan
ज़िंदगी एक अनमोल सफ़र है,
कभी धूप, कभी छाँव की डगर है।
पल-पल में बदलती ये नज़र है,
हर मोड़ पर नई एक ख़बर है।
इसे जीना ही तो असली हुनर है,
क्या खोया, क्या पाया, किसे ख़बर है?
बस चलते रहना ही इसकी बसर है,
यही ज़िंदगी का सच्चा असर है।
Nazm By Furkan S Khan
ये ज़िंदगी भी अजीब पहेली है,
कभी शांत, कभी तूफ़ानी सहेली है।
ढूँढे हर कोई इसका किनारा,
पर मिलता किसी को सहारा नहीं।
मुश्किलें झेलना किसे गँवारा,
पर इसके बिना कोई नज़ारा नहीं।
कभी हँसाती, कभी रुलाती,
पर जीना छोड़ना गवारा नहीं।
ये एक बहती नदी है, आवारा,
जिसका कोई ठिकाना नहीं।
ज़िंदगी का सफ़र
Nazm — By Furkan S Khan
Kaafiya: सफ़र, डगर, नज़र, ख़बर, हुनर, बसर, असर | Radeef: है
ज़िंदगी एक अनमोल सफ़र है,
कभी धूप, कभी छाँव की डगर है।
पल-पल में बदलती ये नज़र है,
हर मोड़ पर नई एक ख़बर है।
इसे जीना ही तो असली हुनर है,
क्या खोया, क्या पाया, किसे ख़बर है?
बस चलते रहना ही इसकी बसर है,
यही ज़िंदगी का सच्चा असर है।
Nazm — By Furkan S Khan
Kaafiya: पहेली, सहेली, किनारा, सहारा, गँवारा, नज़ारा, आवारा | Radeef: नहीं
ये ज़िंदगी भी अजीब पहेली है,
कभी शांत, कभी तूफ़ानी सहेली है।
ढूँढे हर कोई इसका किनारा,
पर मिलता किसी को सहारा नहीं।
मुश्किलें झेलना किसे गँवारा,
पर इसके बिना कोई नज़ारा नहीं।
कभी हँसाती, कभी रुलाती,
पर जीना छोड़ना गवारा नहीं।
ये एक बहती नदी है, आवारा,
जिसका कोई ठिकाना नहीं।
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