उड़ी में 'ऑपरेशन सिंदूर' के एक साल बाद: बच्चों के मन पर गहरे हैं गोलाबारी के निशान
जम्मू-कश्मीर के उड़ी में 'ऑपरेशन सिंदूर' के एक साल बाद भी बच्चे गोलाबारी के गहरे ज़ख्मों से जूझ रहे हैं। जानें कैसे बदल गई उनकी ज़िंदगी और चुनौतियाँ।
Key Highlights
- 'ऑपरेशन सिंदूर' के एक साल बाद भी उड़ी के बच्चों में गोलाबारी का खौफ बरकरार।
- कई बच्चे नींद में भी डरे हुए, पढ़ाई पर भी पड़ रहा असर।
- स्थानीय प्रशासन और एनजीओ मानसिक स्वास्थ्य सहायता पर कर रहे काम।
उड़ी की खामोश चीखें: एक साल बाद भी सहमे बचपन
जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती क्षेत्र उड़ी में 'ऑपरेशन सिंदूर' को भले ही एक साल बीत गया हो, लेकिन इसका दर्द आज भी बच्चों के ज़हन में ताज़ा है। जिस गोलाबारी ने एक वक्त इस शांत घाटी को दहला दिया था, उसके निशान इमारतों से भले ही मिटा दिए गए हों, लेकिन बच्चों के कोमल मन पर वे गहरे उतर गए हैं। वे दिन आज भी कई परिवारों के लिए एक बुरे सपने की तरह हैं।
सहमे हुए बच्चे: रातों की नींद और दिन का सुकून
अचानक हुई गोलाबारी ने उड़ी के बच्चों की ज़िंदगी बदल दी। कई बच्चे आज भी रात को चौंककर उठ बैठते हैं। कुछ को ज़ोर से आवाज़ सुनने पर घबराहट होने लगती है। शिक्षकों का कहना है कि बच्चों का ध्यान पढ़ाई में कम लगता है। वे स्कूल में भी पहले जैसे खुलकर खेल नहीं पाते। यह सब उस भयावह अनुभव का सीधा परिणाम है, जो उन्होंने अपनी आँखों के सामने देखा था।
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