जब रूह जिस्म से जुदा होगी: एक इस्लामी कविता मौत पर

यह कविता मौत की अनिवार्यता और कर्मों के महत्व पर प्रकाश डालती है, जो इस्लामी शिक्षाओं पर आधारित है।

Monday, September 21, 2026
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21 September 2026
जब रूह जिस्म से जुदा होगी: एक इस्लामी कविता मौत पर
Islamic Poetry — By Furkan S Khan
ये दुनिया तो इक ख़्वाब है, इक पल में बिखर जाएगी, हर साँस क़ीमती है, इसे यूँ ही न गँवाइए। जब वक़्त का परिंदा फँसेगा, तो दाना चुग ना पाएगी, बड़ी ख़्वाहिशें, बड़े वादे, सब ख़ाक में मिल जाएँगे। वो लम्हा जब क़ज़ा की पुकार आएगी, न कोई साथी, न कोई हमदम, तन्हाई घिरेगी। हर अमल का हिसाब, उस रब के सामने जाएगा, फ़िर ज़िंदगी की सच्चाई नज़र आएगी। तो आमाल अच्छे कर ले, यही दौलत तेरे साथ रहेगी, हर दुआ, हर नमाज़, तेरी लाज बचाएगी। अल्लाह की रहमत ही आख़िर काम आएगी, जब रूह जिस्म से जुदा होगी, तो जन्नत पाएगी।

क़ज़ा: मृत्यु, मौत का बुलावा। रब: ईश्वर, अल्लाह। आमाल: कर्म, अच्छे कार्य। लाज: मान, इज़्ज़त।

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Mahira Noor
संपादक

A passionate poet who weaves emotions into beautiful words. Writing about love, heartbreak, dreams, and life, one verse at a time.

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